दुर्लभ होती पीपल की छांव, कम होते जा रहे फलदार वृक्ष..

  • आर एस प्रसाद | 03 2020
Zeeshan

भगवान बुद्ध को पीपल के वृक्ष के नीचे हुई थी ज्ञान की प्राप्ति

तरकुलवा | देवरिया पीपल के वृक्ष की महत्ता पुराणों और इतिहास में बखूबी देखने को मिलती है,इस वृक्ष की सकारात्मक ऊर्जा को देखते हुए बड़े-बड़े ऋषि, महात्माओं ने पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर तप किया और ज्ञान अर्जित किया। महात्मा बुद्ध ने पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर ही जन्म -मृत्यु और संसार के रहस्य को जाना था। उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इसलिए इसका महत्व और बढ़ जाता है। पीपल के वृक्ष को धर्म और पुराणों के अलावा विज्ञान ने भी काफी महत्व दिया है प्रकृति विज्ञान के अनुसार पीपल का वृक्ष दिन रात (24 घंटे) ऑक्सीजन छोड़ता है। जो पर्यावरण के लिए काफी महत्वपूर्ण है। पीपल के वृक्ष को अक्षय वृक्ष भी कहा जाता है। पीपल का पेड़ कभी भी पत्ता बिहीन नहीं होता है। इसमें एक साथ पतझड़ नहीं आते बल्कि पुराने पत्ते झड़ते हैं, और नए पत्ते आते रहते हैं। इसी खूबी के कारण इसे। जीवन और मृत्यु चक्र का द्योतक माना जाता है। वर्तमान समय में बढ़ती हुई जनसंख्या और कम होती जमीने इस वृक्ष की संख्या में कमी का एक प्रमुख कारण है। जनसंख्या लगातार बढ़ने से छायादार व फलदार वृक्षों की तेजी से होती कटाने,जंगलों का कटना भी इसके कमी का एक बहुत बड़ा कारण है। पुराने समय में सबके दरवाजे पर कम से कम एक छायादार वृक्ष जरूर होता था।पीपल की छांव में बैठकर चौपाल लगाया करते थे। एक साथ समूह में बैठकर ज्ञानपरक बातें किया करते थे, एक दूसरे के सुख- दु:ख समझते थे,और सहयोगी बनते थे,इन वृक्षों की कमी के कारण खुले हवा में सांस लेना भी दूभर हो गया है। पीपल का छाव मिलना मुश्किल हो गया है। यह चीजें अब धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं।इस औषधीय वृक्ष आयुर्वेद में भी बहुत महत्व है पेट में गैस की तकलीफ़, विष प्रभाव,त्वचा के रोग,सांस के रोग,नकसीर आदि अनेक बीमारियों में बहुत ही संतोषजनक फल देता है।


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