आग़ जलती रहे..

  • मानव टुडे | 07 2020
Zeeshan

मंजुल भारद्वाज

आग़ जलती रहे घर के चूल्हे में पृथ्वी के गर्भ में सूर्य के अस्तित्व में रिश्तों की गर्मजोशी में चाहत के झरने में सांसों के आवागमन में उदर के पाचन में बर्फ़ के सीने में प्रणय पर्व में बीज धारण किए खेत की माटी में विवेक के शांत प्रकोष्ट में बुद्धि के वैचारिक प्रभाग में न्याय पुकारती रूह में आग़ जलती रहे माटी के चोले में जब तक आग़ है तब तक जीवन है जब तक देह है आग़ जलती रहे आग़ नहीं है तो आप जीते जी मोक्ष धाम में स्थापित हैं मुक्ति के लिए आग़ जलती रहे!


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